10/10/2024
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर .....
सुप्रीम कोर्ट के अंतिम 60 दिन.. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति श्री चंद्रचूड़ पर केंद्रित सिलसिलेवार खोजी कहानी ।
रीकैप यानि पुनरावलोकन -
अभी तक आपने - भाग 1 में शीर्षक "गणपत बप्पा मोरया – पूजा में प्रपंच .. " में जाना कि गणेश पूजा पर तर्क-वितर्क का विषय वह दृश्य है जिसमें प्रधानमंत्री आरती दिखा रहे हैं और चीफ जस्टिस आरती गा रहे हैं और इसके बाद से ये सवाल उठने लगा है कि आखिर माननीय चीफ जस्टिस ने आज से पहले और आने वाले दिनों में जो फैसले दिये हैं या जो फैसले देंगे , उनमें वो कितने निष्पक्ष थे या होंगे ? .. यह कहानी आगे बढ़ी । और यह खोजने का प्रयास किया गया कि इत्ती सी सामान्य निजी घटना के अलग अर्थ क्यों उठे ।
इसी प्रकार अपने भाग 2 में शीर्षक “न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्कथन" यानि ‘Restatement of Values of Judicial Life’ on 7 May 1997" को समझने के अलग अलग नजरिए पर हमारी खोजी रिपोर्ट पढ़ी जिसमें हमने नजरिया यानि धारणा को बदलने की आवश्यकता पर जोर देते हुए यह कहा कि विचारों की संकीर्णता कई बार उन्नति और विकास में अवरोध बन जाती है ।
इसी प्रकार अपने भाग 3 में शीर्षक “न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्कथन” न्यायधीशों की आचार संहिता के 16 बिंदुओं को विस्तृत रूप से जाना । यह एक याद रखने की बात है कि 1991-96 के दौरान तत्कालीन सीजेआई एम.एन. वेंकटचलैया के साथ मिलकर जहां श्री पी. वी नरसिम्हा राव ने न्यायधीशों की आचार संहिता के मसौदे पर अपना समर्थन दिया , वहीं प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री इंद्र कुमार गुजराल ने 7 मई, 1997 को इसकी 16 सूत्रीय अंतिम ड्राफ्टिंग पर काम किया तथा अंत में 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बजपाई ने इसको सभी नयायधीशों को अनुपालन हेतु आदेशित किया ।
आज आप भाग -3 को विस्तृत पढ़ें । अगला अंक और भी रोचक होने वाला है जिसमें आप जानेंगे कि राजनीति ही नहीं बल्कि प्रोफेशन की कुशलता और विश्वसनीयता भी पारिवारिक दें होती है ।
भाग - 4 का शीर्षक है "न्याय की विरासत को आगे बढ़ाया, जस्टिस चद्रचूड़ का प्रेरक जीवन सफ़र.. "