02/09/2026
*भगवान बुद्ध की 'ब्रह्मा और विष्णु' द्वारा स्तुति करती हुई, मूर्ति पेशावर (पाकिस्तान) से 1908 में प्राप्त हुई थी*
===============
एड आर एस वर्मा
सम्राट अशोक के समय भारत ईरान की सीमा तक जिसमें *अफगानिस्तान पाकिस्तान बर्मा श्रीलंका* आदि देश आते थे, फैला हुआ था, पेशावर के दक्षिण-पूर्व स्थित घाटी में स्थित एक विशाल बौद्ध पुरास्थल है। सन् 1908 ई. (2451 बौद्ध वर्ष) में अमेरिकी पुरातत्वविद् *डॉ. स्पूनर*, जो भारत के पुरातत्व विभाग में कार्यरत थे, ने एक प्राचीन टीले की खुदाई की। खुदाई में एक विशाल स्तूप के अवशेष तथा अनेक महत्वपूर्ण प्राचीन वस्तुएँ प्राप्त हुईं। इनमें से एक वस्तु *काँस्य-सोने* से निर्मित गोलाकार छत्र थी।
यह प्राचीन धरोहर *धर्मचक्र प्रवर्तन* मुद्रा में भगवान बुद्ध की मूर्ति के रूप में ढली हुई है। इसके दोनों ओर *देव इन्द्र* और *ब्रह्मा* तथागत बुद्ध का उपदेश सुनते हुए दर्शाए गए हैं। इसके पास *प्राकृत-संस्कृत* मिश्रित भाषा में *खरोष्ठी लिपि* में अंकित तीन शिलालेख पाए गए, जिनका अनुवाद डॉ. स्पूनर ने किया।
*शिलालेख-1*
देयधर्मे सर्वसत्वानं हितसुखार्थं भवतु
अर्थ:- यह दान-धर्म (अर्पण) सभी प्राणियों के हित और सुख के लिए हो।
*शिलालेख 2*
दस अगिशाला नवकार्मी कनिष्कविहारे महासेनास संघारामे
अर्थ:-यह नव-निर्मित अग्निशाला (या भवन) महा-सेना के संघाराम में, कनिष्क नामक विहार में स्थित है।
(डॉ. स्पूनर के अनुसार *अगिशाला* शब्द ग्रीक भाषा के “Agesilaos” नाम से उत्पन्न हो सकता है, जो दानदाता का नाम था।)
*शिलालेख 3*
(चार पंक्तियाँ) *कनिष्क महाराज* के राज्य के प्रथम वर्ष में…
यह दान-धर्म सभी प्राणियों के हित और सुख के लिए हो।यह नव-निर्मित अग्निशाला महा-सेना के संघाराम में, कनिष्क विहार में स्थित है।यह सर्वास्तिवादिन संप्रदाय के आचार्यों को अर्पित है।
*समग्र अर्थ*:-यह धरोहर सम्राट कनिष्क के काल में बनाई गई थी और कनिष्क महाविहार में स्थित सर्वास्तिवादिन बौद्ध संघ को अर्पित की गई थी।
*ऐतिहासिक विवरण*
खुदाई के बाद यह धरोहर पहले ब्रिटिश म्यूज़ियम, लंदन में प्रदर्शित की गई। बाद में इसे वापस पेशावर संग्रहालय, पाकिस्तान भेज दिया गया, जो इसका मूल खोज-स्थल था। ब्रिटिश संग्रहालय में इसकी एक प्रतिलिपि (Replica) रखी गई है।
*धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व*
सम्राट कनिष्क के युग में सर्वास्तिवादिन संप्रदाय बौद्ध धर्म का प्रमुख और राजकीय संरक्षण प्राप्त संप्रदाय था।कश्मीर के *कुंडलवन* विहार में हुई बौद्ध संगीति (संगायन) भी इसी संप्रदाय के भिक्षुओं द्वारा आयोजित की गई थी।
यह धरोहर सर्वास्तिवादिन बौद्ध संप्रदाय की समृद्धि, प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक महानता का सशक्त प्रमाण है।